अतिक्रमण हटाने के नाम पर वर्षों से बसे ग़रीब और भूमिहीन परिवारों को डराना एक अन्यायपूर्ण और अमानवीय नीति है। जिन लोगों ने दशकों से सरकारी ज़मीन पर अपना आशियाना बसाया है, उनके लिए वही ज़मीन आज जीवन और अस्तित्व का आधार बन चुकी है। बिना किसी पूर्व सूचना, वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास के बुलडोज़र चलाने की धमकी देना न केवल असंवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि संविधान में प्रदत्त जीवन और गरिमा के अधिकार का भी उल्लंघन है।
सरकार ने पहले भूमिहीन परिवारों को 5-5 डिसिमल ज़मीन देने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक वह वादा ज़मीन पर उतरता नहीं दिखा। बंदोबस्त के सवाल को लगातार नज़रअंदाज़ करते हुए अब उन्हीं परिवारों को ‘अतिक्रमणकारी’ बताकर उजाड़ने की तैयारी की जा रही है। यह नीति साफ़ तौर पर ग़रीब-विरोधी है, जिसमें विकास के नाम पर कमज़ोर तबकों की कुर्बानी दी जा रही है।
विकास का सही अर्थ लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ना है, न कि उन्हें डर और असुरक्षा में धकेलना। बिना बसाए किसी को उजाड़ना स्वीकार्य नहीं है। ग़रीबों के हक़, सम्मान और सुरक्षित जीवन के लिए ऐसी नीतियों का संगठित और लोकतांत्रिक विरोध ज़रूरी है, ताकि इंसाफ़, पुनर्वास और मानवीय गरिमा सुनिश्चित की जा सके।